देशभक्ति याद है, देश भूल गया! आयुष्मान की उड़ता तीर हंसाती है, किन्तु ?

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों और जासूसी जैसे गंभीर विषयों पर अब तक कई फिल्में बनी हैं, लेकिन निर्देशक आकाश ए. कौशिक की नई फिल्म ‘उड़ता तीर’ इन मुद्दों को एक बिल्कुल अलग और मनोरंजक अंदाज में पेश करती है। आयुष्मान खुराना और सारा अली खान जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म गंभीर राजनीति और आतंकवाद को हास्य और व्यंग्य के रंगों में पिरोकर एक बेहतरीन स्पाई-कॉमेडी का अनुभव कराती है। क्रिटिक्स की ओर से इसे 3.5/5 की रेटिंग दी गई है।
‘उड़ता तीर’ की अनोखी कहानी
फिल्म की शुरुआत एक दिलचस्प मोड़ से होती है, जहां भारतीय जासूस विक्रांत (आयुष्मान खुराना) पाकिस्तानी आतंकवादी अजहर मकसूद (मुकुल देव) को पकड़ने के मिशन पर पाकिस्तान की सीमा में पहुंच जाता है। लेकिन इसके तुरंत बाद कहानी में बड़ा ट्विस्ट आता है—खुलासा होता है कि वह असल में भारतीय जासूस नहीं, बल्कि आईएसआई (ISI) का खुफिया एजेंट बिलाल अहमद है, जिसे भारत में जासूसी के लिए भेजा गया था।
भारत में बिलाल अपनी पहचान छिपाकर अपनी मां (सुप्रिया पिलगांवकर) और पत्नी यामिनी (सारा अली खान) के साथ रहता है, जबकि पाकिस्तान में वह जनरल मीर (गुलशन ग्रोवर) और नियाजी (राम कपूर) को रिपोर्ट करता है। कहानी में असली रोमांच तब शुरू होता है जब एक हादसे में उसकी याददाश्त चली जाती है और वह खुद को सचमुच भारतीय जासूस विक्रांत समझने लगता है। उसकी यह बदली हुई पहचान जहां पाकिस्तानी आकाओं की नींद उड़ा देती है, वहीं फिल्म में हास्य और भ्रम की एक अनोखी श्रृंखला शुरू हो जाती है।
सिचुएशनल कॉमेडी और चुटीले संवाद
फिल्म का पहला सीन ही इसके स्पाई-कॉमेडी मिजाज को स्पष्ट कर देता है। हालांकि तार्किक दृष्टिकोण से कहानी में कुछ झोल नजर आ सकते हैं, लेकिन विशुद्ध मनोरंजन के लिहाज से यह किसी कॉमिक राइड से कम नहीं है। गलत पहचान, देशभक्ति को लेकर असमंजस और अप्रत्याशित खुलासों से उपजा हास्य फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है।
निर्देशक आकाश कौशिक ने पाकिस्तानी सियासत और सैन्य तंत्र पर बड़े ही मजेदार तंज कसे हैं। इसके अलावा, ‘तारा सिंह नहीं, तू अशरफ अली है’ जैसे लोकप्रिय फिल्मी संदर्भों और चुटीले संवादों का चतुराई से इस्तेमाल किया गया है, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं। फिल्म का संगीत भी इसके मूड के बिल्कुल अनुकूल है।
कलाकारों का शानदार अभिनय
अभिनय के मोर्चे पर आयुष्मान खुराना फिल्म की जान हैं। कॉमिक टाइमिंग के साथ-साथ ग्रे शेड्स और जटिलताओं से भरे किरदार को उन्होंने जिस सहजता से निभाया है, वह देखते ही बनता है। दिवंगत मुकुल देव की आखिरी फिल्मों में शुमार यह मूवी उनके अभिनय के लिए एक बेहतरीन श्रद्धांजलि है, जिसमें उनका अंदाज खूब हंसाता है।
राहुल बोस, राम कपूर, गुलशन ग्रोवर और बृजेन्द्र काला जैसे अनुभवी कलाकार भी अपने-अपने किरदारों से कॉमेडी का जोरदार तड़का लगाते हैं। हालांकि, सारा अली खान के पास करने के लिए बहुत ज्यादा कुछ नहीं था।
कुल मिलाकर, अगर आप स्पाई-कॉमेडी जॉनर के शौकीन हैं और आयुष्मान खुराना के अभिनय का लुत्फ उठाना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक बेहतरीन मनोरंजन साबित हो सकती है।
क्रिटिक रेटिंग: 3.5/5

