BJP-अकाली दल गठबंधन पर बातचीत, सीटों और CM चेहरे पर फंसा पेंच

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शकील अहमद सैफी
शकील अहमद सैफी

पंजाब की सियासत में एक बार फिर बड़े गठजोड़ की सुगबुगाहट है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता भले ही सार्वजनिक मंचों से राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हों, लेकिन शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन की संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक, दोनों दलों के बीच चुनावी गठबंधन को लेकर एक दौर की बातचीत हो चुकी है। फिलहाल तीन अहम मुद्दों—सीटों की संख्या, सीटों की पहचान और मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री पद के चेहरे—पर पर्दे के पीछे चर्चा आगे बढ़ रही है।

बीजेपी अब जूनियर पार्टनर बनने को तैयार नहीं

अकाली दल के साथ पिछले गठबंधनों में बीजेपी हमेशा जूनियर पार्टनर की भूमिका में रही है। पारंपरिक रूप से वह 117 में से केवल 23 सीटों पर ही चुनाव लड़ती आई है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस बार बीजेपी 25 से कम सीटों पर समझौता करने के मूड में नहीं है। पार्टी अपने इस दावे का आधार 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को बना रही है।

आंकड़ों का गणित: साथ आए तो AAP को मिल सकती है कड़ी टक्कर

हालिया लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ते हुए बीजेपी ने 18.56 प्रतिशत वोट हासिल किए। पार्टी 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाने में कामयाब रही। इसके अलावा छह सीटों पर वह दूसरे और 16 सीटों पर तीसरे स्थान पर रही। इस तरह कुल 45 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी ने अकाली दल को पीछे छोड़ दिया।

दूसरी तरफ, अकाली दल को 13.42 प्रतिशत वोट मिले और वह केवल एक लोकसभा सीट जीत सका। पार्टी नौ विधानसभा क्षेत्रों में पहले, पांच पर दूसरे और पांच पर तीसरे नंबर पर रही।

बीजेपी के आंतरिक आकलन के अनुसार, अगर दोनों दल लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ते, तो यह गठबंधन करीब 32 प्रतिशत वोटों के साथ 57 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल कर सकता था, जो बहुमत के आंकड़े से केवल दो कम है। पार्टी नेताओं का मानना है कि सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है। ऐसे में गठबंधन होने पर दोनों दलों को ‘फ्लोटिंग वोट’ का फायदा मिल सकता है। दरअसल, दोनों दल अकेले चुनाव लड़कर देख चुके हैं कि उन्हें चुनावी सफलता हासिल नहीं हो पा रही है।

सीटों की पहचान पर खींचतान

सिर्फ सीटों की संख्या ही नहीं, बल्कि कौन सी सीट पर किस पार्टी का उम्मीदवार होगा, इसे लेकर भी आम सहमति बननी बाकी है। पुराने फॉर्मूले के तहत बीजेपी शहरी इलाकों में और अकाली दल ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव लड़ता रहा है। लेकिन इस बार अकाली दल सेमी-अर्बन (अर्ध-शहरी) सीटों पर भी अपनी दावेदारी जताने की योजना बना रहा है, जिन्हें बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है। गठबंधन को अंतिम रूप देने से पहले इन सीटों के बंटवारे को सुलझाना होगा।

CM फेस पर उलझन, डेप्युटी CM पर बीजेपी की नजर

नेतृत्व का मुद्दा भी बातचीत के केंद्र में है। अकाली दल चाहता है कि पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए। हालांकि, बीजेपी के कुछ नेताओं को लगता है कि चुनाव में उनकी छवि आड़े आ सकती है।

यह लगभग तय माना जा रहा है कि अगर गठबंधन होता है तो चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री अकाली दल का ही होगा, क्योंकि पार्टी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसे समीकरण में बीजेपी राज्य में उपमुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोक सकती है।

24 साल पुराना है गठबंधन का इतिहास

बीजेपी और अकाली दल का सियासी रिश्ता काफी पुराना है। दोनों दलों के बीच 1996 से लेकर 2020 तक गठबंधन रहा है। इस गठबंधन ने 1997 (अकाली दल 75, बीजेपी 18), 2007 (अकाली दल 49, बीजेपी 19) और 2012 (अकाली दल 56, बीजेपी 12) के विधानसभा चुनावों में प्रचंड जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी। 2012 में लगातार दूसरी बार जीतकर इस गठबंधन ने इतिहास रचा था। इसी जमीनी हकीकत और पुराने प्रदर्शन को देखते हुए दोनों दल फिर से साथ आने पर विचार कर रहे हैं।

ऐलान में जल्दबाजी नहीं, संगठन पर बीजेपी का फोकस

सूत्रों के अनुसार, गठबंधन के औपचारिक ऐलान को लेकर फिलहाल कोई जल्दबाजी नहीं है। बीजेपी अपना पूरा ध्यान जमीनी ढांचा मजबूत करने पर लगा रही है। हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बी.एल. संतोष ने पंजाब का दौरा किया, जहां बूथ स्तर के सांगठनिक ढांचे को दुरुस्त करने पर चर्चा हुई। इसके अलावा, बीजेपी पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ राज्यव्यापी यात्रा निकालने की तैयारी कर रही है, जिसके जरिए केंद्र सरकार के अभियानों की उपलब्धियों को सीधे जनता तक पहुंचाया जाएगा।