POCSO: वैवाहिक विवाद में आरोपों पर सुप्रीम सख्ती, गिरफ्तारी के नए नियम

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शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

पति-पत्नी के बीच बढ़ते वैवाहिक विवाद (Marital Disputes) और बच्चों की कस्टडी (Child Custody) से जुड़े मुकदमों में ‘पॉक्सो एक्ट’ (Protection of Children from Sexual Offences Act) के बढ़ते दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाए गए इस बेहद संवेदनशील कानून के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए शीर्ष अदालत ने देश भर की पुलिस और पॉक्सो अदालतों के लिए कुछ अनिवार्य दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी किए हैं।

क्या था पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान आया, जहां एक मां ने बच्ची की कस्टडी पाने के लिए अपने पति पर गंभीर आरोप मढ़े थे।

  • साल 2024 में एक वैवाहिक विवाद के दौरान मां ने पिता पर अपनी 9 साल की बेटी के यौन शोषण (Sexual Abuse) का आरोप लगाते हुए पॉक्सो के तहत एफआईआर दर्ज करवाई थी।

  • जब मामले की सीबीआई (CBI) जांच हुई, तो यह पूरी तरह से साबित हो गया कि यह आरोप मनगढ़ंत और झूठा था। मां ने कस्टडी हासिल करने के लिए यह झूठी एफआईआर दर्ज कराई थी।

  • इस तथ्य के सामने आने के बाद, जस्टिस जे.बी. पारडीवाला (Justice JB Pardiwala) और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने बच्चे की कस्टडी दोबारा पिता को सौंपने का आदेश दिया।

‘अहंकार में अंधे माता-पिता लगा रहे गंभीर आरोप’

पीठ ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा कि पति-पत्नी केस जीतने और एक-दूसरे के खिलाफ कानूनी बढ़त हासिल करने के लिए बच्चों के यौन शोषण जैसे बेहद गंभीर और संगीन आरोप लगाने से भी नहीं हिचक रहे हैं। अदालत ने कहा, “गुस्से और अहंकार में अंधे माता-पिता अक्सर गलत सलाहकारों के बहकावे में आकर ऐसा कदम उठाते हैं। इससे बेकसूर पक्ष को ऐसा नुकसान और सामाजिक अपमान झेलना पड़ता है, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती।”

पुलिस और अदालतों के लिए सुप्रीम कोर्ट के 4 अहम निर्देश

इन गंभीर टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की पुलिस और विशेष पॉक्सो अदालतों को यह अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं:

  1. बिना सोचे-समझे गिरफ्तारी पर तत्काल रोक: वैवाहिक विवाद या कस्टडी की लड़ाई के दौरान दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों में पुलिस अब तत्काल या रूटीन गिरफ्तारी (Routine Arrest) नहीं कर सकेगी। अपराध होने की पर्याप्त और पुख्ता जानकारी मिलने के बाद ही गिरफ्तारी की जा सकेगी।

  2. बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ से जांच अनिवार्य: पुलिस को गिरफ्तारी से पहले किसी योग्य बाल मनोवैज्ञानिक (Child Psychologist) या मनोचिकित्सक से पीड़ित बच्चे के बारे में निष्पक्ष राय लेनी होगी। यह विशेषज्ञ बच्चे से बात कर उसका स्वतंत्र आकलन करेगा। ऐसे मनोवैज्ञानिक के चयन के लिए जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) की मदद ली जाएगी।

  3. विशेषज्ञ रिपोर्ट के आधार पर ही होगी कार्रवाई: जांच अधिकारी को गिरफ्तारी का फैसला लेने से पहले अन्य सबूतों के साथ-साथ बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार करना होगा। बिना इस रिपोर्ट के पुलिस कोई कठोर कदम नहीं उठाएगी।

  4. सीधी शिकायत पर जज भी बरतेंगे सावधानी: यदि माता-पिता पुलिस के बजाय BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 33 के तहत सीधे कोर्ट में शिकायत दर्ज कराते हैं, तो जज को भी मामला संज्ञान में लेने और आरोपी को समन जारी करने से पहले बाल मनोचिकित्सक से बच्चे का मूल्यांकन (Evaluation) कराना अनिवार्य होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस आदेश का देश के हर पुलिस स्टेशन और फैमिली कोर्ट तक पहुंचना बहुत जरूरी है। इसके लिए कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह इस फैसले की कॉपी सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट को भेजे।