जयराम रमेश का दावा- सरकार की रणनीति संसद में हुई नाकाम

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नई दिल्ली में परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया है कि संसद के बजट सत्र के दौरान परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की सरकार की कोशिश विपक्षी दलों की एकजुटता के कारण सफल नहीं हो सकी।

जयराम रमेश ने अपने बयान में 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में हुए मतदान का हवाला दिया। उनके मुताबिक, संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन सरकार नहीं जुटा सकी। उन्होंने इसे विपक्ष की रणनीति और फ्लोर मैनेजमेंट का नतीजा बताया।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जयराम रमेश का बयान कांग्रेस के राजनीतिक पक्ष को सामने रखता है। सरकार की ओर से इस दावे पर क्या प्रतिक्रिया है, यह अलग सवाल है।

17 अप्रैल के मतदान का जयराम रमेश ने किया जिक्र

कांग्रेस नेता के मुताबिक, 17 अप्रैल को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पर मतदान हुआ था। उन्होंने कहा कि उस समय सदन में 528 सांसद मौजूद थे और विधेयक को पारित कराने के लिए 352 मतों की जरूरत थी।

जयराम रमेश का दावा है कि सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। उनके मुताबिक, इस आंकड़े ने साफ कर दिया कि सत्ता पक्ष के पास संविधान संशोधन को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या नहीं थी।

यही आंकड़ा उनके पूरे राजनीतिक तर्क का आधार है। रमेश का कहना है कि सरकार की ओर से विधेयक को आगे बढ़ाने की तैयारी के बावजूद विपक्षी दलों ने मतदान के दौरान एकजुटता दिखाई।

कांग्रेस, सपा और डीएमके के साथ आने का दावा

जयराम रमेश ने विपक्षी एकता का जिक्र करते हुए कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, एनसीपी और डीएमके की भूमिका की बात कही। खास तौर पर उन्होंने डीएमके का उल्लेख किया और कहा कि कई राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद परिसीमन और राज्यों के अधिकारों के सवाल पर दोनों पक्ष एक साथ खड़े हुए।

उनके मुताबिक, विपक्षी दलों के बीच फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर बनी सहमति ने सरकार के लिए जरूरी समर्थन जुटाना मुश्किल कर दिया।

यहां विवाद का असली राजनीतिक बिंदु यही है। परिसीमन सिर्फ लोकसभा सीटों की संख्या का मामला नहीं है। इसके साथ राज्यों के प्रतिनिधित्व, संघीय ढांचे और भविष्य की राजनीतिक ताकत का सवाल भी जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि दक्षिणी राज्यों की पार्टियां लंबे समय से इस मुद्दे पर अपनी चिंताएं जाहिर करती रही हैं।

543 लोकसभा सीटें बनाए रखने की मांग

जयराम रमेश ने तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष का रुख मौजूदा लोकसभा सीटों को बरकरार रखने के पक्ष में है।

कांग्रेस नेता के मुताबिक, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए और राज्यों के प्रतिनिधित्व में भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिससे किसी राज्य की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो।

उन्होंने महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को मौजूदा लोकसभा सीटों के आधार पर लागू करने की मांग का भी समर्थन किया।

यानी कांग्रेस की आपत्ति सिर्फ परिसीमन की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। पार्टी इस बहस को राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण से जोड़कर देख रही है।

जयराम रमेश ने सरकार पर लगाया नैरेटिव बदलने का आरोप

जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि संसद में मिली राजनीतिक स्थिति के बाद अब मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है।

उन्होंने दावा किया कि सरकार अपनी कथित विफलता का ठीकरा विपक्ष पर डालने के लिए अलग-अलग नैरेटिव तैयार कर रही है। रमेश के मुताबिक, संसद में मतदान के दौरान जो स्थिति सामने आई, वह सरकार की रणनीति के लिए बड़ा झटका थी।

कांग्रेस नेता ने विपक्षी एकता को इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बताया।

परिसीमन पर आगे भी टकराव के आसार

परिसीमन को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच मतभेद अभी खत्म होते नहीं दिख रहे। एक तरफ केंद्र के सामने लोकसभा क्षेत्रों के भविष्य के पुनर्गठन का सवाल है, तो दूसरी तरफ विपक्षी दल राज्यों के मौजूदा राजनीतिक संतुलन को लेकर अपनी चिंताएं उठा रहे हैं।

दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दलों की मुख्य चिंता यह है कि आबादी के आधार पर होने वाले किसी भी संभावित पुनर्गठन से राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है। वहीं, केंद्र की ओर से परिसीमन को लेकर जो भी अगला कदम उठाया जाएगा, उसका असर आने वाले राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल जयराम रमेश ने 17 अप्रैल के मतदान को आधार बनाकर सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। उनके दावों के बाद परिसीमन का मुद्दा संसद के भीतर की राजनीति से निकलकर एक बार फिर राज्यों के अधिकार, प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे की बड़ी बहस में पहुंच गया है।