36 साल बाद लौटे ईरानी युद्धबंदी, पेजेशकियन ने खोला इतिहास का पन्ना

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

17 अगस्त 1990 को ईरान में सिर्फ युद्धबंदियों की वापसी नहीं हुई थी। आठ साल चले ईरान-इराक युद्ध के बाद घर लौट रहे उन लोगों के लिए यह दिन युद्ध की कीमत, इंतजार और परिवार से बिछड़ने की लंबी कहानी का अंत था। 36 साल बाद इसी तारीख पर राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उस दौर को याद करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य, एकजुटता और उम्मीद ही ईरान की ताकत के आधार रहे हैं।

युद्धबंदियों की वापसी

पेजेशकियन ने सोमवार को सोशल मीडिया पर जारी संदेश में 1990 में इराकी कैद से लौटे ईरानी युद्धबंदियों को याद किया। उन्होंने कहा कि कैद के वर्षों में झेली गई तकलीफ केवल युद्ध के इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि उन लोगों की दृढ़ता की कहानी भी है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने देश के सम्मान को बनाए रखा।

ईरान में इन पूर्व युद्धबंदियों को ‘आजादगान’ कहा जाता है। 17 अगस्त 1990 को उनकी वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई थी। यह उस युद्ध के दो साल बाद हुआ, जो 1988 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 598 को स्वीकार किए जाने के साथ समाप्त हुआ था।

आठ साल का युद्ध

ईरान-इराक युद्ध 1980 से 1988 तक चला और आधुनिक पश्चिम एशिया के सबसे लंबे और विनाशकारी संघर्षों में गिना जाता है। युद्ध के दौरान दोनों देशों को भारी सैन्य और मानवीय नुकसान उठाना पड़ा। ईरान में इसे ‘पवित्र रक्षा’ यानी Sacred Defense के नाम से याद किया जाता है।

युद्ध के बाद युद्धबंदियों की अदला-बदली और उनकी वापसी एक अलग मानवीय अध्याय था। कैद से लौटने वालों के लिए घर वापसी का मतलब सिर्फ सीमा पार करना नहीं था। वर्षों तक परिवारों से अलग रहने के बाद उन्हें अपने पुराने जीवन में लौटना था, जबकि उनके पीछे छूटे परिवार युद्ध के अनुभवों के साथ आगे बढ़ चुके थे।

पेजेशकियन का संदेश

पेजेशकियन ने अपने संदेश में तीन शब्दों पर जोर दिया: धैर्य, एकजुटता और उम्मीद। उनका कहना था कि यही तत्व बाहरी दबाव और खतरों के सामने ईरान की मजबूती का आधार हैं।

यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान अपने आसपास बढ़ते सैन्य और राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा है। इसलिए राष्ट्रपति का युद्धबंदियों के इतिहास को वर्तमान से जोड़ना महज स्मरण तक सीमित नहीं है। यह उस ऐतिहासिक अनुभव को आज की राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा बहस से जोड़ने का प्रयास भी है।

हालांकि, यह एक राजनीतिक संदेश है और इसे वर्तमान संघर्षों के परिणाम का स्वतंत्र प्रमाण नहीं माना जा सकता। पेजेशकियन का तर्क मुख्य रूप से ईरान के ऐतिहासिक अनुभव और राष्ट्रीय एकता की उनकी व्याख्या पर आधारित है।

सेना ने भी याद किया

ईरान की सशस्त्र सेनाओं ने भी इस अवसर पर पूर्व युद्धबंदियों की वापसी को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दिवस के रूप में याद किया। बयान में कहा गया कि देश अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा।

विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भी पूर्व युद्धबंदियों की दृढ़ता, आत्मसम्मान और धैर्य को याद किया। उनके संदेश का केंद्र यह था कि युद्धबंदियों का अनुभव आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत है।

इतिहास से वर्तमान तक

ईरान के राजनीतिक विमर्श में ईरान-इराक युद्ध केवल अतीत की घटना नहीं है। ‘Sacred Defense’ की स्मृति आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और बाहरी दबाव के खिलाफ प्रतिरोध की भाषा में इस्तेमाल होती है। मौजूदा नेतृत्व के लिए यह इतिहास एक राजनीतिक संदर्भ भी उपलब्ध कराता है, जिसके जरिए वर्तमान चुनौतियों को देश के पुराने युद्ध अनुभवों से जोड़ा जाता है।

यही वजह है कि 36वीं वर्षगांठ पर दिया गया पेजेशकियन का संदेश केवल पूर्व युद्धबंदियों को श्रद्धांजलि नहीं है। इसमें अतीत की एक घटना को वर्तमान राष्ट्रीय मनोविज्ञान से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।

कितनी बड़ी मानवीय कीमत?

ईरान के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार युद्ध में दो लाख से ज्यादा ईरानी नागरिक और सैन्यकर्मी मारे गए। हालांकि, युद्ध में हताहतों के आंकड़े स्रोत और परिभाषा के अनुसार अलग-अलग मिलते हैं, इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम स्वतंत्र आंकड़ा मानने से पहले स्रोत की प्रकृति देखना जरूरी है।

युद्धबंदियों की कहानी इस व्यापक मानवीय नुकसान का दूसरा पहलू सामने लाती है। किसी युद्ध की कीमत केवल मैदान में मारे गए लोगों से नहीं मापी जाती। वर्षों तक कैद रहने वाले सैनिक, उनके परिवार और युद्ध के बाद सामान्य जीवन में लौटने वाले लोग भी उस कीमत का हिस्सा होते हैं।

36 साल बाद भी क्यों महत्वपूर्ण?

ईरान में 17 अगस्त की स्मृति यह बताती है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी उसका राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव समाप्त नहीं होता। पूर्व युद्धबंदियों की वापसी एक ऐसी घटना है जिसमें सैन्य इतिहास और व्यक्तिगत जीवन एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

पेजेशकियन ने इसी स्मृति को आज की परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा है कि धैर्य और एकता ईरान को बाहरी दबावों का सामना करने में मदद करती है। इस संदेश का राजनीतिक अर्थ चाहे जो निकाला जाए, इतिहास का मानवीय पक्ष स्पष्ट है: युद्ध समाप्त होने की घोषणा कर देना और युद्ध से बाहर निकल जाना दो अलग-अलग घटनाएं हैं।

1990 में लौटे युद्धबंदी अपने साथ सिर्फ कैद की यादें नहीं लाए थे। वे उस युद्ध की जीवित स्मृति बनकर लौटे थे। 36 साल बाद उनकी कहानी फिर सार्वजनिक विमर्श में है, क्योंकि देशों की विदेश नीति बदल सकती है, सत्ता बदल सकती है, लेकिन युद्ध की छोड़ी हुई स्मृतियां अक्सर पीढ़ियों तक बनी रहती हैं।