यूरोपीय संघ से सबक: ब्रिक्स नागरिकों को भी मिलनी चाहिए वैसी सुविधाएं?

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आशीष शर्मा ऋषि
आशीष शर्मा ऋषि

यूरोपीय संघ (EU) आज दुनिया का सबसे सफल क्षेत्रीय एकीकरण मॉडल माना जाता है। 27 सदस्य देशों का यह समूह न सिर्फ आर्थिक बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी गहरे जुड़ाव का उदाहरण पेश करता है। वहीं ब्रिक्स अब 11 देशों का विस्तारित मंच बन चुका है, जो वैश्विक आबादी का लगभग आधा हिस्सा और विश्व GDP का करीब 40 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है। सवाल यह है कि EU के नागरिकों को जो सुविधाएं मिली हैं, क्या वैसी ही सुविधाएं ब्रिक्स देशों के नागरिकों को भी मिलनी चाहिए? और क्या ब्रिक्स इस मॉडल को अपना सकता है?

यूरोपीय संघ के सदस्य देश

वर्तमान में EU के 27 सदस्य देश हैं:ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, क्रोएशिया, साइप्रस, चेकिया, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, आयरलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन और स्वीडन।ये देश अलग-अलग भाषा, संस्कृति और इतिहास रखते हुए भी एक साझा ढांचे के तहत काम करते हैं।

EU के साझा हित क्या हैं?

EU के देशों के साझा हित मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिके हैं:

  • शांति और सुरक्षा: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में दोबारा युद्ध न हो, यह सबसे बड़ा लक्ष्य था। आज भी सामूहिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन साझा हित हैं।
  • आर्थिक एकीकरण: एकल बाजार (Single Market) के जरिए वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और श्रम का स्वतंत्र आवागमन। कई देशों में यूरो मुद्रा भी साझा है।
  • लोकतंत्र, कानून का शासन और मानवाधिकार: साझा मूल्य जो सदस्यता की शर्त हैं।
  • वैश्विक मंच पर एक आवाज: जलवायु परिवर्तन, व्यापार और भू-राजनीति में सामूहिक रुख।

ये हित इतने मजबूत हैं कि देशों ने अपनी कुछ संप्रभुता साझा संस्थाओं (यूरोपीय आयोग, यूरोपीय संसद, यूरोपीय न्यायालय) को सौंप दी है।

EU नागरिकों को मिली सुविधाएं

EU नागरिकता सिर्फ पासपोर्ट नहीं, बल्कि व्यावहारिक अधिकारों का सेट है:
  • स्वतंत्र आवागमन: कोई भी EU नागरिक किसी भी सदस्य देश में बिना वीजा के रह, काम, पढ़ाई या व्यवसाय कर सकता है।
  • शेंगेन क्षेत्र: ज्यादातर देशों में आंतरिक सीमाएं खत्म। रोजाना करोड़ों लोग बिना पासपोर्ट चेक के सीमा पार करते हैं।
  • सामाजिक सुरक्षा का समन्वय: एक देश में जमा पेंशन या स्वास्थ्य बीमा दूसरे देश में भी मान्य।
  • शिक्षा और युवा आदान-प्रदान: इरास्मस कार्यक्रम जैसे माध्यम से छात्रों को आसानी से दूसरे देश में पढ़ने का मौका।
  • उपभोक्ता सुरक्षा और समान मानक: पूरे संघ में एक जैसे उत्पाद सुरक्षा और सेवा मानक।
  • आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा: यूरोपीय स्वास्थ्य बीमा कार्ड से दूसरे देश में इलाज आसान।

ये सुविधाएं सामान्य नागरिक के जीवन को आसान बनाती हैं। काम के लिए दूसरे देश जाना, परिवार से मिलना या व्यापार करना बहुत सरल हो गया है।

ब्रिक्स नागरिकों को भी ऐसी सुविधाएं क्यों मिलनी चाहिए?

ब्रिक्स अब ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया का समूह है। ये देश वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व करते हैं और पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देना चाहते हैं।यदि ब्रिक्स भी EU जैसा मॉडल अपनाए तो:

  • नागरिक आसानी से एक-दूसरे के देशों में काम, पढ़ाई या व्यापार कर सकेंगे।
  • वीजा बाधाएं कम होंगी, पर्यटन और लोगों के आदान-प्रदान बढ़ेंगे।
  • स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा में आपसी मान्यता से करोड़ों लोगों को फायदा होगा।
  • व्यापार लागत घटेगी और युवाओं को नए अवसर मिलेंगे।

वैश्विक दक्षिण के देशों के नागरिकों को भी वैसी ही आवाजाही और आर्थिक अवसर मिलने चाहिए जैसे यूरोप के नागरिकों को मिले हैं। यह न्यायसंगत और समावेशी विकास की मांग है।

ब्रिक्स के लिए ये मॉडल अपनाने में क्या मुश्किलें हैं?

यहां असली चुनौती शुरू होती है। EU मॉडल को ब्रिक्स पर लागू करना आसान नहीं।
पहली बड़ी बाधा — अत्यधिक विविधता

EU देश अपेक्षाकृत समान विकास स्तर, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सांस्कृतिक निकटता रखते हैं। ब्रिक्स में चीन और भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्थाओं के साथ इथियोपिया और मिस्र जैसे विकासशील देश शामिल हैं। प्रति व्यक्ति आय का अंतर बहुत बड़ा है। राजनीतिक व्यवस्थाएं भी अलग-अलग हैं—कुछ लोकतंत्र, कुछ राजतंत्र, कुछ अधिक केंद्रीकृत।
दूसरी बाधा — संप्रभुता छोड़ने की अनिच्छा

EU ने साझा संस्थाएं बनाकर संप्रभुता का कुछ हिस्सा सौंपा। ब्रिक्स देश, खासकर भारत, चीन और रूस, अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को बहुत महत्व देते हैं। कोई भी देश ब्रिक्स न्यायालय या आयोग जैसी संस्था को अधिकार देने को तैयार नहीं दिखता।
तीसरी बाधा — भू-राजनीतिक मतभेद

भारत-चीन सीमा विवाद, रूस-यूक्रेन मुद्दा, मध्य पूर्व के आंतरिक मतभेद—ये सब एकजुटता में बाधा हैं। EU में भी मतभेद होते हैं, लेकिन संस्थागत तंत्र उन्हें संभाल लेता है। ब्रिक्स में ऐसा मजबूत तंत्र नहीं है।
चौथी बाधा — आर्थिक असमानता और चीन का दबदबा

चीन की अर्थव्यवस्था बाकी सदस्यों से कहीं बड़ी है। इससे डर रहता है कि एकीकरण का फायदा मुख्य रूप से चीन को मिलेगा। मुद्रा, व्यापार नियम या श्रम आवागमन पर सहमति बनाना बेहद कठिन होगा।
पांचवीं बाधा — संस्थागत कमजोरी

ब्रिक्स के पास EU जैसी स्थायी नौकरशाही, न्यायालय या बाध्यकारी कानून नहीं हैं। निर्णय आम सहमति से होते हैं, जो धीमे और कमजोर साबित होते हैं।
EU मॉडल ने साबित किया है कि क्षेत्रीय एकीकरण नागरिकों के जीवन को बेहतर बना सकता है। ब्रिक्स नागरिकों को भी स्वतंत्र आवागमन, आसान व्यापार और आपसी सुविधाओं का लाभ मिलना चाहिए। लेकिन मौजूदा हालात में ब्रिक्स के लिए EU जैसा गहरा एकीकरण अपनाना चुनौतीपूर्ण है।ब्रिक्स को पहले व्यापार सुविधा, वीजा उदारीकरण, शिक्षा आदान-प्रदान और डिजिटल भुगतान जैसे व्यावहारिक कदमों से शुरुआत करनी चाहिए। पूर्ण एकीकरण की बजाय चरणबद्ध और लचीला मॉडल ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। वैश्विक दक्षिण को यूरोप की नकल करने की जरूरत नहीं, बल्कि अपनी वास्तविकताओं के अनुरूप एक नया, व्यावहारिक एकीकरण मॉडल गढ़ने की जरूरत है।