BJP ने बिछाई नई बिसात, यूपी-पंजाब-गुजरात में किसे मिली कमान?

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम की घोषणा के अगले ही दिन पार्टी ने राज्यों के संगठन प्रभारियों में भी बदलाव कर दिया। सबसे ज्यादा राजनीतिक महत्व उन तीन राज्यों का है जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा ने उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी विनोद तावड़े को, पंजाब का प्रभार सतीश पूनिया को और गुजरात की कमान तरुण चुघ को दी है। यूपी में जगदीश पटेल और जगदीश ईश्वरभाई पाई को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है।
यह बदलाव महज संगठनात्मक नियुक्तियों तक सीमित नहीं माना जा सकता, क्योंकि जिन राज्यों में प्रभारी बदले गए हैं, वहां अगले विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए अलग-अलग तरह की राजनीतिक चुनौतियां लेकर आएंगे।
यूपी में तावड़े के सामने बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे अहम चुनावी मैदान है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार अगले साल अपने मौजूदा कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे करेगी और भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश करेगी। पार्टी ने यूपी का प्रभार विनोद तावड़े को देकर चुनावी संगठन में एक अनुभवी नेता को आगे किया है।
तावड़े के साथ जगदीश पटेल और जगदीश ईश्वरभाई पाई को सह-प्रभारी बनाया गया है। तीन नेताओं की यह टीम ऐसे समय जिम्मेदारी संभाल रही है जब भाजपा के सामने सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दों में बदलने के साथ-साथ संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय रखने की चुनौती होगी।
यूपी जैसे बड़े राज्य में प्रभारी की भूमिका सिर्फ चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं रहती। उम्मीदवार चयन, सहयोगी दलों के साथ तालमेल, संगठन और सरकार के बीच समन्वय तथा अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर लगातार नजर रखना भी इस जिम्मेदारी का हिस्सा होता है।
गुजरात में चुघ को कमान
गुजरात में भाजपा ने तरुण चुघ को राज्य का प्रभारी बनाया है। गुजरात भाजपा के लिए लंबे समय से मजबूत आधार वाला राज्य रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह गृह राज्य भी है और यहां पार्टी करीब चार दशक से सत्ता में है।
ऐसे में गुजरात में चुनौती सत्ता विरोधी माहौल को रोकने के साथ-साथ संगठन की उस बढ़त को बनाए रखने की होगी जिसने भाजपा को राज्य की राजनीति में लंबे समय से मजबूत स्थिति में रखा है। प्रभारी के सामने पार्टी संगठन और चुनावी रणनीति के बीच तालमेल बनाए रखना अहम होगा।
पंजाब में वापसी की कोशिश
पंजाब की तस्वीर यूपी और गुजरात से अलग है। यहां भाजपा सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है और राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार है। पार्टी ने राजस्थान के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया है।
पूनिया ने जिम्मेदारी मिलने के बाद कहा कि अभी उन्हें नई भूमिका मिली है और इस पर विस्तार से टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के खिलाफ “अंडर करंट” है। उन्होंने दिल्ली का उदाहरण देते हुए कहा कि भाजपा वहां भी बदलाव करने में सफल रही थी।
पूनिया इससे पहले हरियाणा में भाजपा के संगठन और चुनावी अभियान से जुड़े रहे हैं। हरियाणा में पार्टी की लगातार तीसरी जीत के दौरान उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया था। अब पंजाब में उनके सामने उस अनुभव को अलग राजनीतिक परिस्थितियों में इस्तेमाल करने की चुनौती होगी।
अकाली दल वाला सवाल फिर सामने
पंजाब भाजपा के सामने एक और बड़ा राजनीतिक सवाल शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन का है। दोनों दलों के बीच फिर से राजनीतिक समीकरण बनने की अटकलें चल रही हैं, लेकिन फिलहाल गठबंधन को लेकर कोई अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है।
ऐसे में नए प्रभारी की भूमिका सिर्फ संगठन को मजबूत करने तक सीमित नहीं होगी। सहयोगी दलों के साथ संभावित तालमेल, भाजपा के अपने विस्तार और राज्य की चुनावी जमीन पर पार्टी की स्वतंत्र ताकत, तीनों के बीच संतुलन बनाना भी चुनौती का हिस्सा रहेगा।
तीन राज्यों में तीन अलग लड़ाइयां
भाजपा की नई नियुक्तियों को एक ही राजनीतिक फॉर्मूले से समझना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश में पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की कोशिश करेगी। गुजरात में चार दशक के सत्ता आधार को बचाए रखने की चुनौती होगी। पंजाब में भाजपा के सामने सत्ता में वापसी और संगठन के विस्तार का लक्ष्य है।
यही वजह है कि इन नियुक्तियों का चुनावी महत्व अलग-अलग है। यूपी में सवाल सत्ता बरकरार रखने का है, गुजरात में मजबूत किले को बचाने का और पंजाब में कमजोर स्थिति से मुकाबला खड़ा करने का।
नई टीम की पहली बड़ी परीक्षा
नितिन नवीन की अध्यक्षता में भाजपा का नया संगठन अब धीरे-धीरे चुनावी राज्यों की ओर बढ़ रहा है। राष्ट्रीय टीम के बाद राज्य प्रभारियों की घोषणा इस संगठनात्मक पुनर्गठन का अगला चरण है। लेकिन नियुक्तियां अपने आप में चुनाव नहीं जितातीं। असली परीक्षा तब होगी जब ये प्रभारी राज्यों में संगठन, स्थानीय नेतृत्व और मतदाताओं के बीच पार्टी की रणनीति को जमीन पर उतारेंगे।
अगले विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने अपनी संगठनात्मक मशीनरी को तीन अलग-अलग राजनीतिक मैदानों के लिए तैयार करना शुरू कर दिया है। अब देखना यह है कि नई जिम्मेदारियां सिर्फ संगठन की फाइलों में बदलाव करती हैं या चुनावी मैदान में भी उसका असर दिखाई देता है।
