‘मांगना गलत है, लेकिन कोई दे तो ले लेते हैं’, इंजीनियर की बात से मचा हड़कंप

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संजीव पॉल
संजीव पॉल

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले से भ्रष्टाचार को लेकर एक बेहद हैरान करने वाला बयान सामने आया है। यहां के जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री (EE) सीबी अहिरवार ने कैमरे के सामने खुलेआम स्वीकार किया है कि अगर कोई ‘खुशी से’ रिश्वत देता है, तो वे उसे लेने से मना नहीं करते। यह बयान तब आया है जब महज दो दिन पहले ही लोकायुक्त सागर की टीम ने उनके कार्यालय में छापा मारकर एक अकाउंटेंट और एक बाबू को 45 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था।

रिश्वत पर अधिकारी का अजीब तर्क

लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद जब मीडिया ने कार्यपालन यंत्री सीबी अहिरवार से विभाग में कमीशनखोरी को लेकर सवाल किया, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा, “रिश्वत मांगना अपराध है। हमारा या सब-इंजीनियर का कोई रेट या प्रतिशत तय नहीं होता है। लेकिन कोई अपनी खुशी से कुछ दे दे, तो हम मना नहीं करते, रकम ले लेते हैं।” एक जिम्मेदार अधिकारी के मुंह से खुलेआम रिश्वत लेने की इस तरह की स्वीकारोक्ति अब चर्चा का विषय बन गई है।

लोकायुक्त ने रंगे हाथों पकड़े थे दो कर्मचारी

28 अक्टूबर को सागर लोकायुक्त की टीम ने पन्ना के जल संसाधन विभाग के कार्यालय में दबिश दी थी। टीम ने डिविजनल अकाउंटेंट दीपक परिहार को 15 हजार रुपये और लिपिक (बाबू) अरविंद पाठक को 30 हजार रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। दोनों के पास से कुल 45 हजार रुपये की रकम बरामद हुई थी। यह रिश्वत एक ठेकेदार का बिल पास करने और भुगतान जारी करने के एवज में मांगी गई थी।

55 लाख के काम में 25 लाख का भुगतान था अटका

इस पूरे मामले की शिकायत ग्वालियर के ठेकेदार गौरव तोमर ने की थी, जो ‘मां वैष्णो कंस्ट्रक्शन’ के जरिए मझगांय बांध की नहर निर्माण परियोजना का काम कर रहे हैं। ठेकेदार के मुताबिक, उनके काम के करीब 55 लाख रुपये के बिल बन चुके थे, लेकिन चौथा बिल पास कराने और 25 लाख रुपये का अटका हुआ भुगतान जारी करने के लिए विभागीय कर्मचारी लगातार रिश्वत की मांग कर रहे थे। ठेकेदार करीब तीन महीने तक कार्यालय के चक्कर काटता रहा, जिसके बाद उसने लोकायुक्त की शरण ली।

अधिकारी ने दिया फंड की कमी का हवाला

ठेकेदार के भुगतान में हो रही देरी को लेकर जब कार्यपालन यंत्री सीबी अहिरवार से सवाल किया गया, तो उन्होंने इसके पीछे फंड की कमी का हवाला दिया। हालांकि, भुगतान में देरी पर स्पष्टीकरण देने के तुरंत बाद कमीशन को लेकर उनके ‘स्वेच्छा से पैसे लेने’ वाले बयान ने विभाग की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है।