प्यास: जब बूंद-बूंद का हिसाब लगने लगे और पानी पर पहरा बैठ जाए

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राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

अक्टूबर 2026 में महाराष्ट्र—देश का आर्थिक इंजन—खुद प्यासा खड़ा है। तापमान 38 डिग्री पार, बांध सूखते जा रहे हैं और प्रशासन को पानी की बर्बादी पर 5,000 रुपये जुर्माना तथा FIR तक का सहारा लेना पड़ रहा है। यह संकट सिर्फ मौसम का नहीं, दशकों की उपेक्षा का नतीजा है।

तीन शहर, एक कहानी

नागपुर में जलाशयों में महज 58 प्रतिशत पानी बचा है। महानगरपालिका ने साफ चेतावनी दी है—पीने के पानी से गाड़ी धोना, आंगन सींचना या निर्माण कार्य करना अब जुर्म है। हर उल्लंघन पर 5,000 रुपये जुर्माना। अवैध कनेक्शन पर सीधे FIR। पुराने कुओं को साफ कर सोलर पंप लगाने और सीवेज ट्रीटेड पानी के इस्तेमाल के आदेश दिए गए हैं।

पुणे में खड़कवासला बांध श्रृंखला में 12 अक्टूबर तक सिर्फ 26.22 टीएमसी पानी बचा। 15 अक्टूबर 2026 से हर गुरुवार पूरे शहर में पानी सप्लाई बंद रहेगी। वाहन धुलाई केंद्र बंद, निर्माण और स्विमिंग पूल में पीने के पानी पर पाबंदी, हाउसिंग सोसायटियों को STP चालू रखने के निर्देश। लीकेज की शिकायत तुरंत करनी होगी, वरना संकट और गहराएगा।

छत्रपति संभाजीनगर में जायकवाड़ी बांध से रोज 1.649 मिलियन क्यूबिक मीटर (करीब 165 करोड़ लीटर) पानी सिर्फ भाप बनकर उड़ रहा है। यह मात्रा शहर के 18 लाख लोगों के सात दिन के पीने के पानी के बराबर है। अक्टूबर में यह हाल है तो गर्मी में क्या होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

अगर 15-25 साल पहले ध्यान दिया होता…

यह दशा अचानक नहीं आई। महाराष्ट्र में देश के सबसे ज्यादा बड़े बांध हैं, लेकिन सिंचित भूमि महज 17-18 प्रतिशत है।

1999 से 2009 के दशक में सिंचाई पर करीब 70,000 करोड़ रुपये खर्च हुए। फिर भी सिंचाई क्षमता में महज 0.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। “महाराष्ट्र सिंचाई घोटाला” के नाम से जाना जाने वाला यह मामला आज भी याद दिलाता है कि पैसे कहां गए और काम कितना हुआ। अगर उस समय पारदर्शिता और सही प्राथमिकता अपनाई जाती, तो आज बांधों का पानी इतनी तेजी से नहीं सूखता।

मराठवाड़ा और विदर्भ में बार-बार सूखा पड़ता रहा है। 1972 का महासूखा इतिहास में दर्ज है। उसके बाद भी कई बार चेतावनियां आईं। अगर 2000 के बाद गन्ना जैसी पानी ज्यादा मांगने वाली फसलों पर अंकुश, नहरों की नियमित सफाई, रेनवाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य और भूजल दोहन पर सख्ती की जाती, तो आज अक्टूबर में ही पानी का कानून नहीं बनना पड़ता।

बड़े बांधों पर निर्भरता के बजाय स्थानीय जल संरक्षण, छोटी संरचनाएं और कुशल प्रबंधन जरूरी है। अगर 15-20 साल पहले इन सलाहों पर अमल होता, तो अल नीनो और कमजोर मानसून का असर इतना घातक नहीं होता।

अब क्या?

जुर्माना और FIR अस्थायी उपाय हैं। असली समाधान नागरिक अनुशासन, रिसाइकिल पानी का इस्तेमाल और दीर्घकालिक जल नीति में है। महाराष्ट्र की धरती देश को रफ्तार देती है, लेकिन खुद प्यासी रहने का यह मंजर शर्मनाक है।

आज अगर हर नागरिक जल-रक्षक बने और सरकारें पुरानी गलतियों से सबक लें, तभी कल पछतावा नहीं करना पड़ेगा। पानी बचाओ, वरना प्यास ही विरासत बनेगी।