जब पार्टी में पड़ती है फूट, तो चुनाव आयोग कैसे तय करता है असली हकदार?

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच चल रहे विवाद में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने अंतरिम फैसला सुनाते हुए पार्टी के मूल नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और इसके पारंपरिक ‘फूल और घास’ (Flowers & Grass) चुनाव चिह्न पर रोक लगा दी है। आगामी नंदीग्राम उपचुनाव के लिए दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए हैं।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब चुनाव आयोग ने किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न को सीज (फ्रीज) किया हो। पिछले एक दशक में भारत की राजनीति में ऐसे कई हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए हैं। आइए समझते हैं कि कानून क्या कहता है और 10 साल में किन-किन बड़ी पार्टियों का चुनाव चिह्न छिना है।
क्या कहता है कानून?
जब भी किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन होता है और प्रतिद्वंद्वी गुट पार्टी पर कंट्रोल का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग ‘चुनाव प्रतीक (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ (Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968) के पैराग्राफ 15 के तहत हस्तक्षेप करता है। आयोग दोनों गुटों के दावों, विधायकों/सांसदों के समर्थन और संगठनात्मक बहुमत की जांच करता है। जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक मूल चुनाव चिह्न को ‘फ्रीज’ (Freeze) कर दिया जाता है और दोनों गुटों को अंतरिम चिह्न दे दिए जाते हैं।

पिछले 10 सालों के 4 सबसे बड़े चुनाव चिह्न विवाद:
1. AIADMK (तमिलनाडु – 2017)
मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद 2017 में AIADMK दो गुटों में बंट गई—एक का नेतृत्व ओ. पन्नीरसेल्वम कर रहे थे और दूसरे का वी.के. शशिकला और ई. पलानीस्वामी।
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आरके नगर उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग ने पार्टी का प्रसिद्ध ‘दो पत्तियां’ (Two Leaves) चुनाव चिह्न सीज कर दिया।
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दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए अलग-अलग चिह्न (‘टोपी’ और ‘बिजली का खंभा’) दिए गए। बाद में दोनों गुटों के विलय के बाद ‘दो पत्तियां’ चिह्न बहाल कर दिया गया।
2. लोक जनशक्ति पार्टी (LJP – बिहार – 2021)
संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद 2021 में उनके बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति कुमार पारस के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हो गया।
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चुनाव आयोग ने पार्टी का मूल नाम और आरक्षित ‘बंगला’ (Bungalow) चुनाव चिह्न जब्त कर लिया।
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दोनों गुटों को अलग-अलग पहचान और चिह्न देकर चुनाव लड़ने को कहा गया।
3. शिवसेना (महाराष्ट्र – 2022)
महाराष्ट्र का शिवसेना विवाद देश के सबसे चर्चित मामलों में से एक है। 2022 में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुटों ने पार्टी पर दावेदारी ठोक दी।
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अंधेरी पूर्व उपचुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने मूल पार्टी का नाम और प्रतिष्ठित ‘धनुष और तीर’ (Bow and Arrow) चिह्न अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया।
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लंबी सुनवाई के बाद, चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली ‘शिवसेना’ माना और उन्हें ‘धनुष-तीर’ चिह्न सौंप दिया। उद्धव गुट को ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ नाम और ‘मशाल’ चिह्न मिला।
4. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP – महाराष्ट्र – 2024)
शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के बीच चली खींचतान में भी मामला चुनाव आयोग पहुंचा।
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आयोग ने पार्टी संगठन और विधायकों के बहुमत की जांच की।
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फरवरी 2024 में, चुनाव आयोग ने अजित पवार के गुट को असली ‘NCP’ के रूप में मान्यता दी और पार्टी का पारंपरिक ‘घड़ी’ (Clock) चुनाव चिह्न उन्हें इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी। शरद पवार गुट को नई पहचान बनानी पड़ी।
TMC का ताजा मामला (2026):
ताजा मामला पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का है। चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर आगामी उपचुनावों के लिए पार्टी का मूल नाम और ‘फूल-घास’ चिह्न इस्तेमाल करने से रोक दिया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक ‘अंतरिम व्यवस्था’ है, अंतिम फैसला चुनाव आयोग की पूरी कार्यवाही के बाद ही लिया जाएगा।
