सोशल मीडिया की ‘लत’ लगाने वाले फीचर्स पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त

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शकील अहमद सैफी
शकील अहमद सैफी

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार स्क्रॉल करने, वीडियो के अपने आप प्ले होने और बार-बार आने वाले नोटिफिकेशंस का मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। इन फीचर्स को लेकर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़ा सवाल किया है। अदालत जानना चाहती है कि क्या सरकार सोशल मीडिया के ऐसे डिजाइनों को लेकर किसी तरह की नीति बनाने पर विचार कर रही है, जिनका मुख्य उद्देश्य यूजर्स को ज्यादा से ज्यादा समय तक प्लेटफॉर्म पर उलझाए रखना होता है।

जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस अमित शर्मा की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा को निर्देश दिया कि वह इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से रुख स्पष्ट करें। ASG ने अदालत को बताया कि फिलहाल उनके पास सरकार की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं हैं। इसके बाद कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते के लिए टाल दी है।

कानून के प्रोफेसर ने दायर की है जनहित याचिका

यह जनहित याचिका कानून के प्रोफेसर डॉ. विकास कथूरिया की ओर से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि मुख्य समस्या सोशल मीडिया पर मौजूद कंटेंट की नहीं है, बल्कि उन फीचर्स के डिजाइन की है। कंपनियों ने प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया है कि यूजर बार-बार लौटकर आए और वहां ज्यादा से ज्यादा समय बिताए। याचिका में इन फीचर्स की जांच के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित करने की मांग रखी गई है।

इनफिनिट स्क्रॉल और ऑटोप्ले जैसे फीचर्स पर उठे सवाल

याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के कई खास फीचर्स को रेखांकित किया गया है। इनमें इनफिनिट स्क्रॉल (बिना रुके स्क्रॉल करते जाना), वीडियो ऑटोप्ले, शॉर्ट वीडियो, रील्स, कस्टमाइज्ड फीड और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन शामिल हैं। याचिकाकर्ता का दावा है कि इन फीचर्स को ‘इंगेजमेंट मैक्सिमाइजिंग’ और ‘एडिक्शन कॉजिंग’ (लत लगाने वाले) डिजाइन के तहत तैयार किया गया है। इनका मकसद यूजर का ध्यान लगातार बनाए रखना है ताकि एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा अपने आप शुरू हो जाए।

युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर का दावा

याचिका में खासतौर पर 15 से 24 साल की उम्र के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गहरी चिंता जताई गई है। डॉ. कथूरिया के मुताबिक, लगातार सोशल मीडिया के इस्तेमाल से युवाओं में चिंता, डिप्रेशन, कम आत्मसम्मान और साइबर बुलिंग से होने वाले तनाव के मामले बढ़ रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत में सोशल मीडिया पर नुकसानदेह या गैरकानूनी कंटेंट को हटाने के नियम तो मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लत लगाने वाले डिजाइन को नियंत्रित करने की कोई स्पष्ट कानूनी व्यवस्था नहीं है।

मेटा और गूगल जैसी कंपनियों से मुआवजे की मांग

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि केंद्र सरकार विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर इन डिजाइन फीचर्स की जांच कराए और वैज्ञानिक सुरक्षा मानक तैयार करे। जरूरत पड़ने पर ऐसे फीचर्स को सीमित या प्रतिबंधित करने के लिए नियम बनाए जाएं। जनहित याचिका में मेटा, गूगल, टेलीग्राम, एक्स (X) और स्नैपचैट जैसी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों से यूजर्स को हुए मानसिक नुकसान के लिए मुआवजा दिलाने की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि उनका मकसद सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है, बल्कि सिर्फ उन खास फीचर्स को नियंत्रित करना है जो एडिक्शन को बढ़ावा देते हैं।