BJP छोड़ी, तोप चला दी! पूनावाला बोले- मिडिल क्लास सरकार का ATM नहीं

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे शहजाद पूनावाला ने 17 अगस्त 2026 को पार्टी के सभी पदों और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की। उन्होंने अपने इस्तीफे के लिए निजी और वित्तीय परिस्थितियों का हवाला दिया और निजी क्षेत्र में लौटने की बात कही।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। पार्टी से विदाई के बाद पूनावाला ने जिस मुद्दे को सबसे जोरदार तरीके से उठाया, वह था देश का मिडिल क्लास और टैक्स का बोझ। अब उनकी टिप्पणियां सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का नया विषय बन गई हैं।
BJP छोड़ते ही बदला सुर या खुलकर सामने आया पुराना सवाल?
पूनावाला ने सोशल मीडिया पर मध्यम वर्ग की आर्थिक परेशानियों को लेकर तीखे सवाल उठाए। उनका तर्क है कि नौकरीपेशा व्यक्ति अपनी कमाई पर इनकम टैक्स देता है, इसके अलावा GST, टोल, सेस और दूसरे अप्रत्यक्ष करों का भी भुगतान करता है।
इसके बावजूद जब बेहतर सड़क, साफ हवा, गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाओं की बात आती है, तो आम परिवार को अपनी जेब से अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।
यानी टैक्स की रसीद सरकारी सिस्टम की तरफ से आती है, लेकिन सुविधाओं का बिल कई बार जनता को खुद भरना पड़ता है। यही वह जगह है जहां पूनावाला ने बहस को जोरदार तरीके से पकड़ लिया।
‘मिडिल क्लास सरकार का ATM है क्या?’
पूनावाला ने अपने सोशल मीडिया अभियान ‘The Manifesto’ के जरिए कहा कि मध्यम वर्ग कमाता है, टैक्स देता है, लेकिन बदले में उसे पर्याप्त सार्वजनिक सुविधाएं नहीं मिलतीं। उन्होंने सड़क, प्रदूषण, पानी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों का भी जिक्र किया।
उनका सबसे बड़ा प्रस्ताव था कि जब तक देश में विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं, तब तक सैलरीड मिडिल क्लास पर लगने वाला पर्सनल इनकम टैक्स खत्म करने पर विचार होना चाहिए।
सियासत की भाषा में कहें तो सवाल सीधा था, लेकिन निशाना बड़ा था: टैक्स दो तो सुविधा भी दो।
शिक्षा और इलाज पर भी उठाए सवाल
पूनावाला ने यह सवाल भी उठाया कि एक आम नौकरीपेशा परिवार पूरी जिंदगी टैक्स चुकाता है, लेकिन बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए उसे निजी स्कूलों की फीस देनी पड़ती है।
यही स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं में भी दिखाई देती है। परिवार के बुजुर्गों के इलाज से लेकर गंभीर बीमारी तक, बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि अगर नागरिक टैक्स देने के बाद भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए अलग से भारी खर्च करता है, तो उसे टैक्स के बदले मिलने वाली सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल पूछने का अधिकार क्यों न हो?
यही सवाल पूनावाला के ताजा बयानों को सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि टैक्सपेयर बनाम सिस्टम की बहस बना रहा है।
Singapore जैसी सुविधाएं, लेकिन टैक्स का बोझ कम हो?
पूनावाला ने भारत की तुलना सिंगापुर जैसे देशों से करते हुए बेहतर सड़क, सार्वजनिक परिवहन, साफ हवा और पानी जैसी सुविधाओं की बात की।
उनका कहना है कि नागरिकों से टैक्स वसूला जाता है तो सरकारों और टैक्स वसूलने वाली एजेंसियों को यह बताना चाहिए कि जनता के पैसे का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है।
यानी उनकी मांग का फॉर्मूला काफी सरल है: टैक्स कम हो, सुविधाएं ज्यादा हों और हिसाब पूरा मिले।
मिडिल क्लास के लिए यह सुनने में काफी अच्छा फॉर्मूला है। बस समस्या यह है कि सरकारी बजट की एक्सेल शीट शायद इतनी आसानी से रोमांटिक नहीं होती।
सैलरीड क्लास को राहत की मांग
पूनावाला ने नौकरीपेशा वर्ग पर पड़ रहे आर्थिक दबाव को लेकर टैक्स राहत की वकालत की। उनका तर्क है कि वेतनभोगी वर्ग की आय पहले से ही पारदर्शी होती है और टैक्स कटौती सीधे उसकी सैलरी से हो जाती है।
ऐसे में टैक्स सिस्टम में राहत की मांग को उन्होंने मध्यम वर्ग के आर्थिक दबाव से जोड़ दिया है।
यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि मिडिल क्लास की सबसे बड़ी शिकायत यही रहती है कि टैक्स देने के बावजूद निजी शिक्षा, निजी स्वास्थ्य सेवा, आवास, परिवहन और दूसरी आवश्यकताओं पर अलग से खर्च करना पड़ता है।
इस्तीफे के बाद पूनावाला की राजनीति अब किस दिशा में?
शहजाद पूनावाला ने अपने इस्तीफे में कहा है कि वह निजी क्षेत्र में लौटना चाहते हैं और पार्टी से अलग होने के बावजूद BJP की विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के प्रति अपना समर्थन जारी रखने की बात कही है।
इसलिए उनके ताजा बयानों को सीधे तौर पर BJP-विरोधी रुख कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि पार्टी से सक्रिय राजनीतिक भूमिका छोड़ने के तुरंत बाद उन्होंने मध्यम वर्ग, टैक्स और सार्वजनिक सुविधाओं के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है।
अब देखना यह होगा कि उनका यह टैक्स वाला नैरेटिव आगे चलकर सिर्फ सोशल मीडिया बहस बनता है या भारतीय राजनीति में मिडिल क्लास टैक्सपेयर्स की नई पॉलिटिकल पिच तैयार करता है।
