भागवत के कनाडा दौरे पर घमासान, 100+ संगठनों ने सरकार को लिखी चिट्ठी

टोरंटो: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित कनाडा दौरे को लेकर वहां राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अब 100 से ज्यादा कनाडाई हिंदू संगठनों, सामुदायिक समूहों और नागरिक अधिकार संगठनों ने प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों को पत्र लिखकर भागवत के दौरे का समर्थन किया है।
संगठनों ने कनाडा सरकार से कहा है कि भागवत को देश में प्रवेश देने या रोकने का फैसला राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध विश्वसनीय सबूत, कानून और उचित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए। यह पत्र ऐसे समय आया है जब कनाडाई सांसदों के एक वर्ग की ओर से भागवत को देश में प्रवेश से रोकने की मांग की जा रही है।
भागवत का कनाडा दौरा 31 अगस्त और 1 सितंबर को प्रस्तावित है। यह RSS प्रमुख के तौर पर उनका कनाडा का पहला दौरा होगा। यह यात्रा RSS के वैश्विक संपर्क अभियान के तहत अमेरिका और ब्रिटेन की यात्रा के साथ हो रही है।
भागवत के समर्थन में क्या कहा गया?
प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के अलावा यह पत्र सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री गैरी आनंदसांगरी, इमिग्रेशन मंत्री लीना मेटलेज डियाब और विदेश मंत्री अनीता आनंद को भेजा गया है।
पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले संगठनों ने कहा कि भागवत का प्रस्तावित दौरा कनाडा के हिंदू समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कनाडा में रहने वाले हिंदू समुदाय की संख्या 10 लाख से अधिक बताते हुए RSS को भारत का एक बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बताया।
संगठनों ने भागवत को कनाडा में प्रवेश से रोकने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों के लिए विश्वसनीय और स्वतंत्र रूप से जांचे जा सकने वाले सबूत जरूरी हैं।
‘आरोप हैं तो सबूत भी दिखाएं’
पत्र में उन आरोपों पर भी सवाल उठाए गए हैं जिनमें भागवत पर कथित तौर पर नफरत भरे भाषण, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का समर्थन, लोगों को डराने और आपराधिक या प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों से संबंध रखने जैसे आरोप लगाए जाते हैं।
हस्ताक्षरकर्ता संगठनों ने कहा कि ये गंभीर आरोप हैं और इन्हें केवल राजनीतिक दावों के आधार पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि अगर इन आरोपों के पीछे ठोस सबूत मौजूद हैं तो उन्हें उचित कानूनी और सरकारी प्रक्रिया के तहत जांचा जाना चाहिए।
कनाडा के मौजूदा इमिग्रेशन नियमों के तहत किसी विदेशी नागरिक को सुरक्षा, आपराधिक गतिविधि, मानवाधिकार उल्लंघन, संगठित अपराध और कुछ अन्य आधारों पर देश में प्रवेश से रोका जा सकता है। प्रवेश की पात्रता का आकलन संबंधित इमिग्रेशन या सीमा अधिकारी करते हैं।
‘दौरे से खतरे का ठोस आधार क्या है?’
संगठनों ने भागवत के दौरे से सामाजिक अशांति या सुरक्षा संबंधी खतरे की आशंका पर भी सवाल उठाए। पत्र में पूछा गया कि क्या ऐसे विशिष्ट मामले या विश्वसनीय सूचनाएं हैं, जिनसे यह साबित होता है कि भागवत या RSS की गतिविधियों से कनाडा में अशांति पैदा हुई है या उनके प्रस्तावित दौरे से सार्वजनिक सुरक्षा को वास्तविक खतरा है।
उनका तर्क है कि यदि इस तरह की जानकारी मौजूद है तो सरकार को उसे स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत देखना चाहिए। लेकिन बिना ठोस आधार के किसी व्यक्ति को केवल उसके राजनीतिक या वैचारिक संबंधों के कारण प्रवेश से रोकना अलग सवाल खड़ा करेगा।
हिंदू समुदाय के अधिकारों का भी मुद्दा
पत्र में इस पूरे विवाद को कनाडा के बहुसांस्कृतिक समाज और धार्मिक स्वतंत्रता से भी जोड़ा गया है। संगठनों ने कहा कि कनाडाई हिंदुओं को भी दूसरे धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों की तरह अपनी आस्था, संगठन और सार्वजनिक गतिविधियों के अधिकार हासिल हैं।
संगठनों का कहना है कि यदि भागवत को पर्याप्त सबूत के बिना रोका जाता है तो इससे कनाडा में रहने वाले हिंदू समुदाय के एक हिस्से में यह धारणा पैदा हो सकती है कि उनके साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है।
हालांकि, पत्र लिखने वाले संगठनों ने शांतिपूर्ण विरोध और भागवत की आलोचना के अधिकार को भी स्वीकार किया है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के विचारों या राजनीतिक भूमिका का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना और प्रवेश प्रतिबंध दो अलग-अलग मुद्दे हैं।
दूसरी तरफ भागवत के खिलाफ विरोध
भागवत के कनाडा दौरे का विरोध भी हो रहा है। एनडीपी सांसद जेनी क्वान और हीदर मैकफर्सन समेत कुछ राजनीतिक आवाजों ने उनके प्रवेश पर सवाल उठाए हैं और उन्हें कनाडा में प्रवेश के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की है।
यही वह बिंदु है जिसने भागवत की यात्रा को महज एक सामुदायिक कार्यक्रम से निकालकर कनाडा की इमिग्रेशन नीति, सार्वजनिक सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी राजनीतिक बहस में बदल दिया है।
एक तरफ विरोध करने वाले समूह भागवत और RSS को लेकर गंभीर वैचारिक और सुरक्षा संबंधी सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ 100 से ज्यादा संगठनों का समूह कह रहा है कि ऐसे आरोपों पर कार्रवाई के लिए सबूत और कानून की प्रक्रिया जरूरी है।
किन संगठनों ने समर्थन किया?
पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में कनाडा इंडिया फाउंडेशन, कनाडा इंडिया ग्लोबल फोरम, कैनेडियन आर्य समाज, ब्रैम्पटन हिंदू सोसाइटी, हिंदू सोसाइटी ऑफ कनाडा, हिंदू मिशन ऑफ कनाडा, हिंदू सभा मंदिर, हिंदू स्वयंसेवक संघ और वीएचपी कनाडा समेत कई मंदिर, सांस्कृतिक और सामुदायिक संगठन शामिल बताए गए हैं।
इस पूरे विवाद में अब गेंद कार्नी सरकार के पाले में है। कनाडाई कानून किसी व्यक्ति की स्वीकार्यता का फैसला निर्धारित कानूनी आधारों पर करता है, जबकि भागवत के प्रस्तावित दौरे पर राजनीतिक और सामुदायिक दबाव अलग-अलग दिशाओं से बढ़ रहा है।
