Meta पर सरकार सख्त, CSAM से लेकर WA Username तक बढ़ी निगरानी?

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शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

नई दिल्ली: बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर केंद्र सरकार ने Meta के सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारतीय कानूनों के उल्लंघन की स्थिति में किसी प्लेटफॉर्म को मिलने वाली Safe Harbour सुरक्षा को स्वतः असीमित नहीं माना जा सकता। बातचीत के दौरान Child Sexual Abuse Material यानी CSAM और WhatsApp Username से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई है।

सरकार का संदेश केवल Meta तक सीमित नहीं है। WhatsApp Username से जुड़े मामले की जांच को उद्योग-स्तर पर देखने की बात सामने आई है, क्योंकि सरकार के अनुसार इससे जुड़े सवाल दूसरे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर भी लागू हो सकते हैं।

CSAM पर सरकार का सख्त संदेश

CSAM यानी बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए सबसे संवेदनशील और गंभीर कंटेंट श्रेणियों में आती है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, Meta के साथ बातचीत में ऐसी सामग्री की पहचान, रोकथाम और उसे हटाने की व्यवस्था पर जोर दिया गया।

यहां Safe Harbour का मुद्दा महत्वपूर्ण है। सामान्य तौर पर यह कानूनी ढांचा मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों को यूजर्स की ओर से डाली गई सामग्री के लिए कुछ परिस्थितियों में सुरक्षा देता है। लेकिन यह सुरक्षा कानून से ऊपर नहीं है। किसी विशेष मामले में Safe Harbour लागू होगा या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित कानून और परिस्थितियों के आधार पर होता है।

कार्रवाई कानून के दायरे में

सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के खिलाफ उठाए जाने वाले कदम मौजूदा कानूनों और सरकार को मिले वैधानिक अधिकारों के दायरे में होने चाहिए। यानी कंटेंट मॉडरेशन या प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई के मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।

यह बिंदु इसलिए अहम है क्योंकि ऑनलाइन कंटेंट को लेकर सरकार और टेक कंपनियों के बीच बहस केवल कंटेंट हटाने तक सीमित नहीं रहती। इसमें यूजर की निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और कानून के अनुपालन जैसे कई सवाल एक साथ जुड़ते हैं।

भारत की भाषाई चुनौती

सरकार ने Meta के कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम को भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया है। भारत में बड़ी संख्या में भाषाएं और बोलियां इस्तेमाल होती हैं और ऑनलाइन बातचीत में स्थानीय संदर्भ, स्लैंग, कोड-मिक्सिंग तथा क्षेत्रीय अभिव्यक्तियां आम हैं।

ऐसे माहौल में केवल एक समान वैश्विक मॉडरेशन मॉडल हर स्थिति को सही ढंग से पकड़ पाएगा या नहीं, यह अपने आप में तकनीकी और नीतिगत सवाल है। सरकार की चिंता यही है कि भारतीय यूजर्स के लिए कंटेंट मॉडरेशन स्थानीय भाषाई संदर्भों को भी पर्याप्त रूप से समझे।

WhatsApp Username पर नजर

WhatsApp Username से जुड़ा मुद्दा भी सरकार की निगरानी में है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इसे केवल Meta और WhatsApp तक सीमित मामला नहीं माना जा रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस तरह के मुद्दों को उद्योग-स्तर पर देखा जा रहा है, क्योंकि भविष्य में समान व्यवस्था दूसरे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर भी लागू हो सकती है।

इसका मतलब यह है कि सरकार का फोकस किसी एक कंपनी के फैसले से आगे बढ़कर डिजिटल मैसेजिंग इकोसिस्टम में यूजर पहचान, सुरक्षा और प्लेटफॉर्म जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवालों पर है।

AI कंटेंट पर भी नई निगरानी

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर AI से तैयार सामग्री का बढ़ता इस्तेमाल सरकार की प्राथमिकताओं में एक और बड़ा मुद्दा है। सरकार सिंथेटिक या AI-generated कंटेंट की स्पष्ट पहचान यानी लेबलिंग पर जोर दे रही है, ताकि यूजर यह समझ सके कि उसके सामने मौजूद सामग्री वास्तविक रूप से रिकॉर्ड या तैयार की गई है या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से बनाई गई है।

यह बदलाव केवल तकनीक की पहचान का मामला नहीं है। चुनाव, सार्वजनिक सूचना, बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे क्षेत्रों में किसी सामग्री की वास्तविकता को लेकर भ्रम पैदा होना व्यापक असर डाल सकता है। इसलिए AI कंटेंट की पारदर्शी पहचान आने वाले समय में प्लेटफॉर्म रेगुलेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

असली परीक्षा प्लेटफॉर्म की जवाबदेही की

Meta के साथ सरकार की बातचीत से एक व्यापक संकेत जरूर मिलता है: भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म से केवल बड़ी संख्या में यूजर्स को सेवा देने की अपेक्षा नहीं, बल्कि भारतीय कानूनों के अनुरूप जवाबदेही की भी अपेक्षा की जा रही है।

लेकिन इस नीति की अगली परीक्षा इसके क्रियान्वयन में होगी। CSAM जैसे गंभीर कंटेंट के खिलाफ तेज कार्रवाई और यूजर अधिकारों की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है, AI-generated सामग्री की पहचान कितनी प्रभावी होती है और Safe Harbour से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या अलग-अलग मामलों में कैसे की जाती है, ये सवाल आगे भी केंद्र में रहेंगे।

फिलहाल सरकार का रुख स्पष्ट है: डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए सुरक्षा का मतलब कानून से छूट नहीं है। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, कंटेंट की जवाबदेही और AI-generated सामग्री की पारदर्शिता, तीनों मोर्चों पर आने वाले महीनों में सरकार और टेक कंपनियों के बीच टकराव से ज्यादा महत्वपूर्ण शायद वह व्यवस्था होगी जो दोनों के बीच बनेगी।