उदयपुर से राष्ट्रीय ST मोर्चे तक रावत; BJP ने राजस्थान से चुने दो अलग चेहरे

भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में राजस्थान को मिली जगह सिर्फ नामों की सूची नहीं है। इसमें एक तरफ उदयपुर के सांसद डॉ. मन्नालाल रावत को अनुसूचित जनजाति मोर्चे की कमान दी गई है, तो दूसरी तरफ चार्टर्ड अकाउंटेंट और लंबे समय से संगठन में सक्रिय राजेश मंगल को राष्ट्रीय सह-कोषाध्यक्ष बनाया गया है। दोनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग है, काम का क्षेत्र अलग रहा है, लेकिन नई जिम्मेदारियां भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में राजस्थान के दो अलग-अलग चेहरों को राष्ट्रीय मंच पर ले जाती हैं।
रावत को ST मोर्चे की कमान
उदयपुर से लोकसभा सांसद डॉ. मन्नालाल रावत का राष्ट्रीय संगठन में उभार अपेक्षाकृत तेज रहा है। राजनीति में आने से पहले वे राजस्थान परिवहन विभाग में अधिकारी रहे और उदयपुर में आरटीओ के तौर पर काम किया। बाद में वे परिवहन विभाग में अतिरिक्त आयुक्त के पद तक पहुंचे। सरकारी सेवा के दौरान दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में उनकी सामाजिक सक्रियता और जनजातीय संगठनों से जुड़ाव ने उन्हें स्थानीय स्तर पर पहचान दिलाई। 2024 में उन्होंने सरकारी सेवा से वीआरएस लेकर चुनावी राजनीति में कदम रखा।
एक चुनाव, फिर राष्ट्रीय जिम्मेदारी
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उदयपुर की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट से तत्कालीन सांसद अर्जुनलाल मीणा की जगह मन्नालाल रावत को उम्मीदवार बनाया। रावत ने कांग्रेस के ताराचंद मीणा को हराकर पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया। अब एक लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति मोर्चे की जिम्मेदारी मिली है। यह नियुक्ति उन्हें राजस्थान की राजनीति से निकालकर देशभर में आदिवासी संगठन और राजनीतिक पहुंच से जुड़े काम के केंद्र में ले आती है।
आदिवासी राजनीति का बड़ा मैदान
ST मोर्चे की जिम्मेदारी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड और देश के कई अन्य राज्यों में आदिवासी मतदाता चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। हालांकि किसी नियुक्ति का राजनीतिक परिणाम पहले से तय मानना उचित नहीं होगा, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर रावत की नई भूमिका भाजपा के जनजातीय संपर्क को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में इस्तेमाल की जा सकती है। उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि दक्षिण राजस्थान में विकसित स्थानीय संपर्क और अनुभव को राष्ट्रीय संगठन के व्यापक दायरे में किस तरह बदला जाता है।
मंगल की एंट्री अलग कहानी
राजेश मंगल की कहानी चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचने वाले नेता की नहीं, बल्कि पेशेवर विशेषज्ञता से संगठन के भीतर जगह बनाने वाले कार्यकर्ता की है। वे पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और भाजपा के चार्टर्ड अकाउंटेंट प्रकोष्ठ में राजस्थान स्तर पर जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उन्हें अब राष्ट्रीय सह-कोषाध्यक्ष बनाया गया है। इस भूमिका में पार्टी के वित्तीय और संगठनात्मक प्रबंधन से जुड़े काम उनकी पेशेवर विशेषज्ञता के सीधे उपयोग का क्षेत्र बन सकते हैं।
CA से संगठन तक
राजेश मंगल मूल रूप से राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले के पावटा क्षेत्र से हैं। छात्र राजनीति से उनका सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ। राजस्थान विश्वविद्यालय में एमकॉम की पढ़ाई के दौरान वे छात्रसंघ में सचिव रहे। इसके बाद उन्होंने चार्टर्ड अकाउंटेंसी को पेशे के रूप में अपनाया और संगठनात्मक राजनीति में भी सक्रिय बने रहे। उपलब्ध विवरण के अनुसार 2010 के आसपास भाजपा के CA प्रकोष्ठ की गतिविधियों में उनकी सक्रियता बढ़ी और बाद में प्रदेश स्तर पर उन्हें वित्तीय एवं संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिलती गईं।
दिल्ली तक कैसे पहुंचा नेटवर्क
मंगल का संगठनात्मक सफर केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहा। 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने संगठनात्मक और चुनावी प्रबंधन से जुड़े काम किए। इसी दौर में उनका संपर्क भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से बढ़ा। बाद के वर्षों में चुनावी वित्तीय प्रबंधन और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़ी भूमिकाओं ने उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय नेटवर्क के करीब पहुंचाया। BPCL और NMDC में स्वतंत्र निदेशक के रूप में काम करने का अनुभव भी उनके पेशेवर प्रोफाइल का हिस्सा रहा है।
दो नियुक्तियां, दो संदेश
मन्नालाल रावत और राजेश मंगल की नियुक्तियों को एक ही राजनीतिक चश्मे से देखना मुश्किल है। रावत की जिम्मेदारी सामाजिक और राजनीतिक संगठन विस्तार से जुड़ी है, जबकि मंगल की भूमिका पार्टी के वित्तीय ढांचे से संबंधित है। एक चेहरा आदिवासी समाज के बीच संगठनात्मक पहुंच का प्रतिनिधित्व करता है, दूसरा पेशेवर विशेषज्ञता को पार्टी संगठन में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति को दिखाता है। यही अंतर भाजपा की नई टीम में राजस्थान के प्रतिनिधित्व को महज संख्या से आगे ले जाता है।
राजस्थान का राष्ट्रीय संगठन में वजन
नई टीम में राजस्थान से वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और सतीश पूनिया तथा सुनील बंसल को राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के साथ रावत और मंगल को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं। इससे राजस्थान का प्रतिनिधित्व संगठन के अलग-अलग स्तरों पर दिखाई देता है। हालांकि इन नियुक्तियों से प्रदेश की भविष्य की चुनावी रणनीति के बारे में सीधे निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि राजस्थान के नेताओं को राष्ट्रीय संगठन के अलग-अलग कामकाज में जगह मिली है।
