यूपी 2027 के लिए BJP ने क्यों उतारी गुजरात की टीम? छिपा बड़ा चुनावी प्लान

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी कुछ दूर है, लेकिन BJP ने चुनावी तैयारी को संगठन के स्तर पर तेज कर दिया है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने उत्तर प्रदेश के लिए विनोद तावड़े को प्रभारी और गुजरात के जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी बनाया है। दोनों नियुक्तियां इसलिए चर्चा में हैं क्योंकि तावड़े को चुनावी संगठन और मैनेजमेंट का अनुभव है, जबकि जगदीश पटेल का सीधा जुड़ाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी सीट के 2024 लोकसभा चुनाव अभियान से रहा है।

इन नियुक्तियों को केवल सामान्य संगठनात्मक बदलाव मानना मुश्किल है। खासकर जगदीश पटेल का वाराणसी अनुभव और गुजरात BJP संगठन से उनका जुड़ाव इस बात की ओर इशारा करता है कि उत्तर प्रदेश में बूथ स्तर के संगठन, माइक्रो मैनेजमेंट और चुनावी नेटवर्क पर खास जोर दिया जा सकता है। हालांकि, इसे सीधे ‘गुजरात मॉडल की वापसी’ कहना अभी राजनीतिक विश्लेषण का विषय है, पार्टी की घोषित रणनीति नहीं।

गुजरात से यूपी तक संगठन की एक्सरसाइज

BJP चुनावी राज्यों में अनुभवी संगठनकर्ताओं और कार्यकर्ताओं को दूसरे राज्यों में इस्तेमाल करती रही है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में गुजरात BJP से जुड़े करीब 165 कार्यकर्ताओं की टीम के उत्तर प्रदेश में काम करने का उल्लेख मिलता है। इन कार्यकर्ताओं को विधानसभा क्षेत्रों से लेकर बूथ स्तर तक अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं।

इस रणनीति का मकसद सिर्फ चुनावी गतिविधियां बढ़ाना नहीं था। स्थानीय संगठन को सक्रिय करना, बूथ कमेटियों की स्थिति समझना, मतदाताओं से संपर्क और जमीनी फीडबैक जुटाना इसके प्रमुख हिस्से रहे हैं।

यही वजह है कि गुजरात से जुड़े संगठनकर्ता को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दिए जाने पर BJP की पुरानी चुनावी कार्यशैली की चर्चा शुरू हुई है।

वाराणसी से पूरे यूपी तक जगदीश पटेल

जगदीश पटेल की नियुक्ति का सबसे दिलचस्प पहलू उनका वाराणसी कनेक्शन है। 2024 लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी सीट पर BJP के अभियान में उनकी भूमिका रही थी। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, वह चुनावी अधिसूचना से कई महीने पहले ही वाराणसी में सक्रिय हो गए थे।

अब वही संगठनात्मक अनुभव पूरे उत्तर प्रदेश में इस्तेमाल किया जा सकता है। वाराणसी जैसी हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट पर काम करने का अनुभव और गुजरात BJP से जुड़ाव उन्हें इस नई भूमिका में अलग पहचान देता है।

पटेल पहले अमराईवाड़ी से विधायक और सूरत के मेयर भी रह चुके हैं। ऐसे में उनकी भूमिका केवल राजनीतिक चेहरा बनने तक सीमित रहने के बजाय संगठन और चुनावी प्रबंधन से जुड़ी रहने की संभावना है।

तावड़े की नियुक्ति क्यों अहम?

विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना भी BJP की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तावड़े लंबे समय से संगठन और चुनाव प्रबंधन से जुड़े रहे हैं। ऐसे बड़े राज्य में उनकी नियुक्ति यह बताती है कि पार्टी 2027 की लड़ाई को केवल लोकप्रिय चेहरों और बड़े राजनीतिक अभियानों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में चुनावी गणित विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से बदल जाता है। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे और संगठन की ताकत एक जैसी नहीं है। ऐसे में केंद्रीय संगठन के स्तर पर ऐसा व्यक्ति जरूरी होता है जो अलग-अलग क्षेत्रों की चुनावी जरूरत के हिसाब से रणनीति को लागू करा सके।

यही वह जगह है जहां तावड़े और पटेल की जोड़ी महत्वपूर्ण हो सकती है।

2024 का झटका BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती

2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजों ने BJP के लिए कई पुराने चुनावी समीकरणों पर सवाल खड़े किए। पार्टी 80 में से 33 सीटों पर रही, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं।

इस नतीजे ने BJP को यह समझने का मौका दिया कि मजबूत केंद्रीय अभियान के बावजूद राज्य स्तर पर संगठन, स्थानीय उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और बूथ मैनेजमेंट में कमजोरी चुनावी परिणाम बदल सकती है।

2027 में विधानसभा की 403 सीटों पर लड़ाई होगी। इसलिए BJP के लिए चुनौती केवल सरकार बचाने की नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में संगठन को फिर मजबूत करने की भी है जहां 2024 में पार्टी को नुकसान हुआ।

क्या यह वही मोदी-शाह वाला मॉडल है?

‘गुजरात मॉडल’ शब्द को सिर्फ विकास की राजनीति तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। BJP की चुनावी राजनीति में गुजरात लंबे समय तक संगठनात्मक प्रयोगों की जमीन भी रहा है। बूथ स्तर की निगरानी, चुनावी डेटा का इस्तेमाल, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करना और हर विधानसभा क्षेत्र के लिए अलग रणनीति इस मॉडल की प्रमुख विशेषताओं में गिने जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में गुजरात से जुड़े संगठनकर्ताओं की तैनाती इसी सोच की याद जरूर दिलाती है।

लेकिन एक फर्क महत्वपूर्ण है। गुजरात और उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समाज एक जैसा नहीं है। गुजरात का चुनावी अनुभव सीधे यूपी में कॉपी नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण, क्षेत्रीय दलों की भूमिका, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक गठजोड़ कहीं अधिक जटिल हैं।

इसलिए BJP अगर गुजरात के संगठनात्मक अनुभव का इस्तेमाल करती भी है तो उसे यूपी की स्थानीय राजनीतिक जमीन के हिसाब से ढालना पड़ेगा।

2027 के साथ 2029 पर भी नजर

उत्तर प्रदेश BJP के लिए केवल विधानसभा चुनाव का राज्य नहीं है। 80 लोकसभा सीटों के कारण 2027 का संगठनात्मक प्रदर्शन 2029 की राष्ट्रीय चुनावी रणनीति से भी जुड़ा रहेगा।

2024 में यूपी में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन ने BJP के राष्ट्रीय आंकड़ों को प्रभावित किया था। ऐसे में 2027 में संगठन को मजबूत करना पार्टी के लिए दोहरा लक्ष्य हो सकता है। पहला, उत्तर प्रदेश में सत्ता बरकरार रखना और दूसरा, 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए फिर से मजबूत चुनावी मशीनरी तैयार करना।

यही कारण है कि विधानसभा चुनाव से काफी पहले संगठनात्मक जिम्मेदारियों का बंटवारा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

गुजरात में भी संगठन का नया संतुलन

इसी फेरबदल में तारुण चुग को गुजरात की जिम्मेदारी दी गई है। यानी BJP ने गुजरात से जुड़े नेताओं को उत्तर प्रदेश में लगाया है, जबकि दूसरे राज्यों में संगठनात्मक अनुभव रखने वाले नेता को गुजरात भेजा गया है।

यह व्यवस्था बताती है कि पार्टी राज्यों को अलग-अलग चुनावी प्रयोगों और संगठनात्मक अनुभवों के आदान-प्रदान के तौर पर भी देख रही है।

उत्तर प्रदेश में तावड़े और पटेल की असली परीक्षा बूथ स्तर पर होगी। कितने कार्यकर्ता सक्रिय होते हैं, स्थानीय संगठन कितना मजबूत होता है, 2024 के बाद कमजोर पड़े इलाकों में पार्टी कितनी तेजी से नेटवर्क खड़ा करती है और सामाजिक समीकरणों को किस तरह साधा जाता है, इन्हीं मोर्चों पर इस रणनीति की प्रभावशीलता तय होगी।